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फैज़ हर राह थी सर बशर मंज़िल , हम जहां पहुंचे कामयाब आये।

उत्तर प्रदेश (पश्चिमी )मेरी जन्म भूमि रहा ,उत्तर और तत्कालीन मध्य प्रदेश मेरी छात्र भूमि (१९५६-१९६७ )रहा। हरियाणा कर्म भूमि(१९६७ -२००५ )। 

अनिकेतन रहा मैं ता - उम्र।उम्र कटी हरयाणा के प्रभुत्व शाली बलशाली ,प्रभावी ,प्रमुख समुदाय के सुविधा संपन्न निकेतनों में (किराए के खूबसूरत मकानों में ) . बखूबी वाकिफ हूँ इस प्रमुख समुदाय के व्यंग्य विनोदी हंसोड़ स्वभाव से ज़िंदादिली ,हाज़िर -जवाबी और खुद के साथ ही मज़ाक करने के हौसले से माद्दे से। इनके क्षात्र तेजस से। हुनरमंदी से। 

जाट शब्द 'जट'(जड़ )से निकल के पल्ल्वित हुआ और देखते ही देखते 'क्षात्र -तेज' का पर्याय  बन गया। भारतीय प्रतिरक्षा के शौर्य के सर्वश्रेष्ठ शिखर को जिस कौम  ने आगे बढ़कर  छुआ है ,जिसके बिना भारतीय सैन्य बलों के शौर्य की चर्चा संपन्न नहीं होती वह प्रभतवशाली समुदाय दो मुहावरों के सिरों के बीच में आज भी अपना प्रभुत्व बनाये हुए है.

उत्तर प्रदेश पश्चिमी में एक मुहावरा बचपन से सुना :

"अनपढ़ जाट पढ़ा  जैसा ,पढ़ा लिखा जाट खुदा जैसा "

और एक और मुहावरा बड़ा प्रचलन में रहा -"जाट रे जाट तेरे सर पे खाट "

इनमें एक इस समुदाय में व्याप्त कथित जड़ता और दूसरा अहंकार का प्रतीक समझा गया है। 

इस दौरान इस समुदाय ने विकास के नए क्षितिज तोड़े हर क्षेत्र में कला से विज्ञान तक साहित्य और फिल्मों  से लेकर पहलवानी तक। अपना एक अलग कीर्तिमान कायम किया है इस समुदाय ने। 

फैज़ हर राह थी सर बशर मंज़िल ,

हम जहां पहुंचे कामयाब आये। (फैज़ अहमद  फैज़ )

'Faiz ' my destination was on my way ,where I reached I returned victorious.

मुझे इस समुदाय का यही उद्भवित इवॉल्व्ड रूप क़ुबूल है। मैं इस समुदाय  की जड़ता और अहंकार को स्वीकृति देने में अपने को असमर्थ पाता हूँ और चाहता हूँ भगवान् उन्हें हर प्रकार की उस जड़ता से जो यहां वहां अवशेषी रह गई है वेस्टिजियल ऑर्गन की तरह उससे इस समुदाय को आज़ाद   करे।इनमें एक तत्व ऐसा भी है जो बदलने को तैयार नहीं है ,कथित जातीय गौरव की यथास्थिति को बनाये हुए है।

उसका असल रूप 'जाट रेजिमेंट' है शेष सब छद्म रूप ही कहे समझे जाएंगे।   

मुझे बेहद पीड़ा होती है कथित  ओनर किलिंग्स के  मामले से खासकर तब जब वह अपने ही धर्म में विजातीय प्रेम से सम्बद्ध रहा हो। 

ताज़ा मामला रोहतक का है जिससे मुझे अपार पीड़ा पहुंची है। मैं इसकी निंदा करता हूँ और दुष्यंत कुमार जी के शब्दों को दोहराता हूँ :

हो गई है पीर परबत सी पिघलनी चाहिए ,

इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए। 

आज ये दीवार  पर्दों  की तरह हिलने लगी,

शर्त ये थी के ये बुनियाद हिलनी चाहिए। 

हर सड़क पर ,हर गली में  ,हर नगर ,हर गाँव में ,

हाथ लहराते हुए ,हर लाश चलनी चाहिए। 

सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं ,

मेरी कोशिश है ,के ये सूरत बदलनी चाहिए। 

मेरे सीने  में नहीं ,तो तेरे सीने में सही ,

हो कहीं भी आग ,लेकिन आग जलनी चाहिए। 

प्रस्तुति :वीरुभाई (वीरेंद्र शर्मा ),पूर्व व्याख्याता ,भौतिकी एवं प्राचार्य गमेण्ट पोस्ट ग्रेजुएट कॉलिज ,बादली (झज्जर )हरियाणा। 


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